देश में व्यवस्थाओं के नाम पर अव्यवस्थायें फैलाने की कोशिशें निरंतर तेज होती जा रहीं हैं। नियमों के नाम पर पर्सनल ला बनाने का क्रम बढता जा रहा है। स्वाधीनता के बाद संविधान निर्माण के दौरान जहां जातियों, सम्प्रदायों, स्थानों, भाषाओं, क्षेत्रों, संस्कृतियों के आधार पर विभाजन करने वाले विशेष कानूनों का प्राविधान किया गया ताकि भविष्य में सत्ता का संचालन चन्द लोगों के हाथों में ही रह सके, तो दूसरी ओर लालफीताशाही ने कार्यपालिका को निरंकुश बनाने की दिशा में विभागों को मनमाने आचरण करने की छूट देने की गरज से अलग-अलग कानूनों का निर्माण कर लिया। विधायिका के सत्ता पक्ष ने अपनी ठेकेदार पार्टी के हितों के साथ स्वयं की स्वार्थपूर्ति को स्थायित्व देने की नियत से नागरिकों को मुफ्तखोरी की आदत डालकर उन्हें हरामखोर बनाने की प्रतिस्पर्धा जीतने में जी-जान लगा दी। परिणामस्वरूप हरामखोरों ने बडी-बडी जमातें बनाकर आपराधिक वारदातों से धनकुबेर का पदग्रहण करके विलासता की दिशा में बढना शुरू कर दिया। जातिगत एकता के नाम पर चन्द चालाक लोगों ने नेता बनकर विष वमन के माध्यम से सामाजिक खाई को चौडा किया। सम्प्रदाय विशेष के हितों को संरक्षित करने का दिखावा करने वाले मजहबी उस्तादों ने अतीत की इबारतों को दोहराने की कसमें खाना शुरू कर दी। ऐसे में देश की जडों में मट्ठा पिलाने की कबायत करने वाले कार्यपालिका के चन्द अधिकारियों ने अपनी तन, मन और धन की असीमित हवस को शान्त करने हेतु विशेष कानूनों के दायरे बढाने शुरू कर दिये। अतीत के पन्ने पलटने पर ज्ञात होता है कि स्वाधीनता के दौरान कलेक्टर के पद पर तैनात व्यक्ति के पास केवल राजस्व विभाग के सीमित अधिकार होते थे जो वर्तमान में असीमित घोषित हो गये हैं। पैर रखने का अधिकार पाने वाले ने आहिस्ता-आहिस्ता सुख-सुविधायुक्त विश्राम का आशियाना खडा कर लिया है, गुलामों की फौज पैदा कर ली है और जोड लिया है यशगान करने वालों का कुनवा। बात केवल कलेक्टर तक ही सीमित नहीं है। सोची-समझी योजना के तहत जिस तरह से राजस्व वसूली का जिला मुखिया समूचे जिले का बादशाह बन गया उसी तरह सभी विभाग प्रमुखों ने अपने लिये विशेष अधिनियम, कानून और प्राविधानों का निर्माण कर लिया है। न्याय विभाग, वन विभाग, विद्युत विभाग, स्वास्थ्य विभाग, आबकारी विभाग, परिवहन विभाग जैसे लगभग सभी विभागों ने अपने-अपने कानूनी दायरे बढाकर मनमानियों, तानाशाही और अनियमितताओं पर कवच लगा लिया है। पुलिस विभाग की तो अपनी अलग ही कहानी है। याचक की पुकार सुनने वालों पर आरोपों की अनगिनत कहानियां स्वयं ही कानून की धज्जियां उडाने वाले कथानकों से भरी पडीं हैं। सभी की अपनी अलग-अलग तानाशाही है। अलग-अलग ढपली पर अलग-अलग राग अलापे जा रहे हैं। कई बार तो विभिन्न विभागों के मध्य भी अधिकारों की जंग छिड जाती है। वर्तमान के ही अनेक उदाहरण देश के विशेषाधिकारों के युध्द की नई परिभाषायें लिख रहे हैं। देश की सीमा पर जान की बाजी लगाकर नागरिकों को सुख की नींद सोने का अवसर प्रदान करने वाली सेना के कर्नल पुष्पेन्दर सिंह बाठ को पटियाला में पंजाब पुलिस ने न केवल बेरहमी से पीटा बल्कि उसके पुत्र को भी अपने जुल्म का शिकार बनाया। हड्डियां तोड देने तक किये गये पुलिसिया प्रहार की प्राथमिकी भी दर्ज नहीं की गई। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमती नगर डिवीजन के ग्वारी पावर हाउस से जुडे उपभोक्ताओं के विद्युत संयोजन मनमानी वसूली के बाद भी विच्छेद कर दिये गये। इसी तरह छतरपुर जिले में मध्यप्रदेश के विद्युत विभाग के अधिकारियों ने बिजली के बिल जमा करने के बाद भी गढीमलहरा क्षेत्र के कलानी गांवों के निवासियों की बिजली काट कर अपनी बेलगाम कार्यशैली की बानगी पेश की है। पैसों की वसूली के बाद भी रसीद न देने के आरोप भी ग्रामीणों ने विभाग के उत्तरदायी अधिकारियों पर लगाये हैं। बार अभ्यारण्य के अफसरों के मनमाने फरमान के विरोध में गाइड एवं जिप्सी संघ व्दारा अनिश्चितकालीन हडताल की घोषणा भी नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह गई। सरकारी चिकित्सालयों में तैनात अनेक डाक्टरों की मनमानी के शिकार हो रहे मरीजों-तामीरदारों की संख्या में बेतहाशा वृध्दि हो रही है। सरकारी सप्लाई वाली दवाओं के उपलब्ध होने के बाद भी खुले बाजार की दवाओं के लिए तामीरदारों को मजबूर करने वाले चिकित्सक आपरेशन के दौरान अपने दलालों के माध्यम से सुविधा शुल्क वसूलने में जुटे हैं। कार में बैल्ट तथा बाइक में हैलमेट न लगाने वालों का चालान काटने वालों को बिना नम्बर प्लेट के डम्पर, टैक्टर, आटो रिक्सा, लोडर, पिकअप आदि वाहन तथा बिना फिटनेश के बस और ट्रक नहीं दिखाई पडते हैं। अनेक ढाबों के केबिनों में अवैध रूप से चल रहे दारू दंगल को अदृष्टिगत करने वाले उत्तरदायी अधिकारियों व्दारा कागजी खानापूर्ति के लिए निरीह लोगों पर शिकंजा करने वाले प्रकरण भी बढते जा रहे हैं। सफेदपोश नेतृत्व की आड में पूरा कुनवा ही कानून की धज्जियां उडाने का लाइसेंसी बन जाता है। निजी वाहनों पर विभाग का नाम, पद का नाम लिखकर धौंस जमाने वालों की असीमित संख्या खुलेआम संविधानिक व्यवस्था का मुखौल उडा रही है। सरकारी अमले में तैनात व्यक्ति के परिवारजनों, संबंधीजनों तथा स्वजनों के निज निवासों से लेकर स्वयं के संसाधनों तक पर विभाग का नाम मोटे-मोटे अक्षरों में अंकित देखा जा सकता है। पुलिस लिखे वाहनों की संख्या सबसे अधिक पायी जाती है। एम्बुलेन्स वाहनों का अवैध परिवाहन तो कोरोना काल में समूचे देश ने देखा है। सभी विभागों के अपने-अपने विशेषाधिकार कानूनों ने देश के नागरिकों को रक्तपिपासुओं के मध्य कैद कर दिया है। इन कैदियों की संख्या में तो अब विधायिका के सदस्यों तक के नाम भी जुडने लगे हैं। आश्चर्य होता है कि कार्यपालिका के उत्तरदायी अधिकारियों पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए देश की राजधानी दिल्ली के विधानसभा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता को प्रदेश की कार्यपालिका के मुखिया यानी मुख्य सचिव धर्मेन्द्र को पत्र लिखना पडा। पत्र में उन्होंने स्पष्ट किया है कि प्रदेश के विभिन्न अधिकारी सदन के माननीय सदस्यों के पत्रों, फोन काल्स तथा संदेशों को स्वीकार तक नहीं करते हैं। विधायिका पर हावी होती कार्यपालिका का यह कीर्तिमानी उदाहरण शायद ही किसी लोकतांत्रिक देश में देखने को मिला हो। विधानसभा अध्यक्ष का यह पत्र स्पष्ट करता है कि सरकारी सीयूजी मोबाइल फोन्स, इन्टरनेट कनेक्शन, वातानुकूलित कार्यालय, सुविधायुक्त आवास, लग्जरी सेवाओं जैसे दर्जनों संसाधन देने के बाद भी कार्यपालिका का रवैया अपने आम में स्वयं के निर्णय पर ही चलता है। उत्तर प्रदेश का कमीशनखोरी का मामला तो इन्वेस्टर्स के मध्य खासा चर्चित है जहां विधायिका व्दारा आमंत्रित अतिथियों के प्रस्तावों पर अन्तिम स्वीकृति के लिए पापड बेलने के नये तरीकों को रेखांकित किया जा रहा है। कार्यपालिका के अनेक उत्तरदायी अधिकारियों की स्वार्थपरितापूर्ण मनमानी कार्य प्रणाली की बढती संख्या से जहां आम नागरिक हताशा के मध्य से गुजर रहा है वहीं इन्वेस्टमेन्ट के लिए भेजे जाने वाले न्योते भी बैरंग वापिस आने शुरू हो गये हैं। कार्यपालिका का यह दिखने वाला स्वरूप विकास की संभावनाओं पर पानी फेरता प्रतीत हो रहा है। इस हेतु आम आवाम को व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप की स्वयं समीक्षा करना पडेगी, तस्वीर संवारने के प्रयास करना पडेंगे और खडा होना होगा कमर कसकर अन्याय के विरुध्द तभी सार्थक परिणामों की संभावना पैदा हो सकेगी। समय रहते देश में समाप्त करने होंगे विभागों के पर्सनल ला तभी एक देश-एक कानून की परिकल्पना साकार हो सकेगी। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
@डॉ. रवीन्द्र अरजरिया