विज्ञान और अध्यात्म के बारे में यह एक आम धारणा है कि ये दोनों एक दूसरे के परस्पर विरोधी हैं परंतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस धारणा का खंडन करते हुए कहा है कि कि अध्यात्म और विज्ञान में परस्पर कोई विरोध नहीं हैं , अगर व्यक्ति के अंदर आस्था हो तो अध्यात्म और विज्ञान, दोनों ही उसके साथ न्याय करते हैं लेकिन अगर जिसको अपने साधन और ज्ञान का अहंकार है उसे अध्यात्म और विज्ञान में ज्ञान नहीं मिल सकता। संघ प्रमुख ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि श्रद्धा में अंधत्व का कोई स्थान नहीं है। जानो और मानो यही श्रद्धा है। संघ प्रमुख ने कहा कि गत 2000 वर्षों में विश्व अहंकार के प्रभाव में चला है । यह अपनी ज्ञानेंद्रिय से मैं जो प्राप्त करता हूं वही सही है । इसी सोच के साथ मानव तब से चला है जब से विज्ञान का प्रादुर्भाव हुआ है लेकिन यही सब कुछ नहीं है। विज्ञान का भी एक दायरा है , एक मर्यादा है ,इसलिए यह मानना ग़लत है कि विज्ञान के आगे कुछ नहीं है। संघ प्रमुख ने विगत दिनों नई दिल्ली में मुकुल कानिटकर द्वारा लिखित पुस्तक 'बनाएं जीवन प्राणवान' के विमोचन समारोह के मुख्य अतिथि की आसंदी से अपने विचारों को व्यापक संदर्भों में और स्पष्ट करते हुए आगे कहा कि यही भारतीय सनातन संस्कृति की विशेषता है कि हमने बाहर देखने के साथ साथ अंदर देखना भी प्रारंभ किया और अंदर तह तक जाकर जीवन के सत्य को जान लिया। इसका और विज्ञान का विरोध होने का कोई कारण नहीं है। जानो तब मानो । अध्यात्म में भी यही पद्धति है। साधन अलग हैं । अध्यात्म में साधन मन है।मन की ऊर्जा प्राणों से आती है। प्रबल प्राण शक्ति व्यक्ति को आगे ले जाने की सामर्थ्य प्रदान करती है।
संघ प्रमुख ने जीवन में तप को महत्वपूर्ण बताते हुए कि राष्ट्रीय स्तर पर और व्यक्तिगत स्तर पर तप की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इसकी जड़ों में एक प्राण शक्ति है । भारत में भी एक प्राणशक्ति है जो हमारे सामने है लेकिन हम उसे देख नहीं पा रहे हैं। वह प्राण हर व्यक्ति और हर चीज में है। वह प्राण 22 जनवरी को दिखाई दिया जिस दिन अयोध्या में नवनिर्मित भव्य राममंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा का अनुष्ठान कार्यक्रम संपन्न हुआ । संघ प्रमुख ने कहा कि जब दुनिया में कहीं संकट आता है तो भारत तुरंत उसकी मदद के लिए आगे आता है। भारत कभी यह नहीं देखता कि वह देश हमारा मित्र है अथवा शत्रु है। भारत की चेतना के पीछे यही प्राण दिखाई देता है। यही भारत की पहचान है।
वर्तमान समय में अपरिहार्य जीवन मूल्यों पर आधारित इस अनमोल पुस्तक के विमोचन समारोह में पंचदशनाम जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर आचार्य अवधेशानंद गिरि एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति योगेश सिंह की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। अवधेशानंद गिरि ने अपने व्याख्यान में कहा कि प्राण का आधार परमात्मा है जो सर्वत्र है । प्राण की सत्ता परमात्मा से ही है। उसमें स्पंदन है । उसी से चेतना है। उसी से अभिव्यक्ति है, उसी से रस संचार है और वही जीवन है। पुस्तक लेखन के मुकुल कानिटकर की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि परमात्मा की सहज अभिव्यक्ति प्राण है और उसकी व्याख्या इस पुस्तक में की गई है।
इस अवसर पर पुस्तक के लेखक मुकुट कानिटकर ने पुस्तक लेखन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में सब कुछ वैज्ञानिक है। आयुर्वेद, वास्तुशास्त्र, स्थापत्य के साथ ही दिन चर्या तथा ऋतुचर्या के सभी नियम भी बिना कारण के नहीं है। संपूर्ण सृष्टि में प्राण आप्लावित है। लेखक ने आशा व्यक्त की कि नयी पीढ़ी के मन में उठने वाले सामान्य संदेहों के शास्त्रीय कारण स्पष्ट करने में उनकी पुस्तक सहायक सिद्ध होगी। समारोह में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो योगेश सिंह ने भी अपने व्याख्यान में कहा कि आज की पीढ़ी तर्क प्रधान पीढ़ी है लेकिन तर्क एक सीमा तक ही सही है। योगेश सिंह ने पुस्तक की विषयवस्तु की सराहना करते हुए कहा कि यह पुस्तक को पढ़कर जीवन से संबंधित लाइफ स्टाइल को समझने का मौका मिलेगा। इस पुस्तक में सभी को कुछ न कुछ नया मिलेगा।प्रो. योगेश सिंह ने कहा 100 वर्ष पुराने दिल्ली विश्वविद्यालय में संघ प्रमुख मोहन भागवत के आगमन को अविस्मरणीय पल बताया।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक एवं संघ विषयों के जानकार है)